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ये हैं बिहार के टॉप 5 मंदिर जहाँ दर्शन भर से दूर हो जाता है कष्ट – बोलता है बिहार

बिहार के टॉप 5 मंदिर : बिहार में मंदिरों और धार्मिक स्थलों की कमी नहीं हैं। पटना समेत सभी जिलों में लगभग सभी भगवानों के मंदिर भड़े पड़े हैं। उतनी हीं संख्या में बिहार में शिवालय भी हैं। सभी मंदिरों की अपनी कथाएँ हैं सभी के अपनी अपनी मान्यताएँ हैं। मन्दिर में पूजा अर्चना करने से भक्त के सभी दुख दूर हो जाते हैं। बोलता है बिहार के टॉप 5 के श्रृंखला में हम आपको बिहार के टॉप 5 मंदिर के बारे में बतायेंगे जिसकी ख्याति दूर दूर तक फ़ैली हुई है।

बिहार के टॉप 5 मंदिर

 

मुँदेश्वरि मंदिर, कैमुर

शुरू करते हैं बिहार के प्रसिद्ध मुँदेश्वरि मंदिर की जोकि कैमुर में स्थित है। सबसे आश्चर्य की बात यह है की यहाँ बिना रक्त बहाए हीं बकरे की बलि चढ़ जाती है। मान्यता यह भी है की आप माँ की मूर्ति पर अधिक देर तक नज़र टिकाए नहीं रख सकते हैं। इसी मंदिर में एक पंचमुखी शिवलिंग भी है जो 3 बार अपना रंग बदल लेता है यानी की तीनों पहर। माँ के इस मंदिर को शक्तिपीठ भी कहा जाता है।

मुँदेश्वरि मंदिर कैमुर

इस मंदिर के बारे में कई बातें प्रचलित हैं। पहाड़ों पर स्थित माँ मुँदेश्वरि मंदिर पर पहुँचने के लिए तकरीबन 608 फीट ऊँचे पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है। यहाँ प्राप्त शिलालेखों के मुताबिक माँ मुँदेश्वरि मंदिर 389 ई० के आस पास का है जोकि इसके प्राचीनतम होने का सबूत भी है। पहाड़ि पर बिखरे कई पत्थर और स्तंभ भी है। उनको देखकर पता लगता है की उसपर श्री यंत्र स्थित मंत्र उत्कृण हैं।

पवरा पहाड़ि के शिखर पर स्थित माँ मुँदेश्वरि भवानी मंदिर की नक्काशी अपने आप में मंदिर की अपनी पहचान दिलाती है। मन्दिर इतना पौराणिक है की माँ मुँदेश्वरि की मूर्ति कब और किस पत्थर से बनी है इसकी जनकारी शिलालेख पर अंकित है। शिलालेख से हीं पता चलता है की मंदिर में रखी मूर्तियाँ उत्तरगुप्त कालीन है। माँ मुँदेश्वरि मंदिर पत्थर से बना अस्टकोणीय मंदिर है।

कहा जाता है की एक जमाने में इस इलाके में चंड और मुंड नाम के असुर हैं जो लोग को काफी परेशान करते थे। भक्तों की पुकार से माँ भवानी पृथ्वी पर आई और दोनों का संघार कर ली और बाद में माँ अंतरध्यान हो गयी। तब से ये जगह माँ मुँदेश्वरि देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी और दूर दराज से लोग आकर यहाँ पूजा अर्चना करते हैं।

पुनौरा धाम, सीतामढ़ी

बिहार के सीतामढ़ी जिले के पुनौरा गाँव में माँ जानकी मंदिर है जिसे पुनौरा धाम के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल ये धरती माँ सीता की जन्म भूमि है इसलिए इसका नाम सीतामढ़ी पड़ा है। शहर से 5 किलोमीटर पश्चिम में पुनौरा गांव स्थित है। इसी गांव में माँ जानकी की भव्य मंदिर है।

 

कहा जाता है की एक बार मिथला में भीषण अकाल पड़ा था। पुरोहित ने राजा जनक को खेत में हल चलाने की सलाह दी थी। पुनौरा में राजा जनक खेत में जब हल चला रहे थे तब जमीन से एक घडा़ निकला था। उसी घड़े में माँ सीता नवजात अवस्था में मिली थी। पुनौरा के आसपास माँ सीता और राजा जनक से जुड़े कई तीर्थ स्थल हैं। जहाँ राजा ने हल जोतना प्रारंभ किया था वहाँ उन्होंने पहले शिव का पूजन किया था जिसको हलेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है।

पुनौरा धाम सीतामढ़ी

इतना हीं नहीं पुनौरा धाम के मंदिर के पीछे जानकी कुंड के नाम से एक सरोवर है। जिस सरोवर को लेकर मान्यता है की जो भी इसमें स्नान करता है उसको संतान की प्राप्ति होती है। यहाँ पंथ पाकार नामक एक जगह है। कहा जाता है की यहाँ के नाम माँ सीता के विवाह से जुड़ी हुई है। इस जगह पर अभी भी प्राचीन पीपल का पेड़ है और इसके नीचे अभी भी पालकी बनी हुई है।

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देव सूर्य मंदिर , औरंगाबाद

बिहार से छठ पर्व की परंपरा जुड़ी हुई है। छठ पूजा में छठ माता से जुड़ी है। छठ पूजा में छठ माता के साथ साथ सूर्य की भी पूजा होती है। उस दिन डूबते और उगते सूर्य को अर्ग दिया जाता है और सूर्य की उपासना होती है। वैसे तो बिहार में कई भगवान सूर्य के मंदिर हैं और सभी का अपना एक अलग महत्व है। इसी कड़ी में बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर का भी एक अपना अलग हीं महत्व और इतिहास है।

देव सूर्य मंदिर औरंगाबाद

छठ पर्व के दौरान इस मंदिर की खासियत और बढ़ जाती है। यहाँ हर साल छठ पूजा के दौरान पारण के दिन सूर्य महोत्सव का आयोजन किया जाता है। यहाँ पर सूर्य कुंड तलाव का भी विशेष महत्व है। कहा जाता है की देवाशूर संग्राम में जब आशूरों के हाथ जब देवता हार गए थे तब देवमाता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवआर्णय में छठी मैया की पूजा की थी। तब खुश होकर छठ माता ने अदिति को सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था।

कहा जाता है यहाँ भगवान सूर्य 3 स्वरूपों में मौजूद है। पुरे देश में सिर्फ यही सूर्य मंदिर है जहाँ मुख पुरव की और ना होकर पश्चिम की और है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान सूर्य ब्रह्मां, विष्णु और शिव तीनों के स्वरूपों में विराजमान हैं। गर्भ गृह के मुख्य द्वार के बांयी और सूर्य की प्रतिमा है और दायीं और भगवान शंकर की गोद में बैठी हुई प्रतिमा है। ऐसी प्रतिमा सूर्य के अन्य मंदिरों में देखने को नहीं मिलती है।

कीम वंदती है की इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था वह भी सिर्फ एक रात में। मंदिर के बाहर पाली लिपि में लिखे होने से पता चलता है की इस मंदिर का निर्माण 8-9वीं शदी के बीच हुआ था और यह मंदिर बहुत हीं व्याखात है।

विष्णुपद मंदिर, गया

अब बात करेंगे गया की विष्णुपद मंदिर की। दरअसल गया तीर्थ सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ शहर है। तर्थराज, प्रयाग, वाराणसी, ऋषिकेश के तरह गया सात पूर्यो में तो शामिल नहीं है लेकिन ये स्थान “स्वर्ग का द्वार” माना जाता है। पितृ पक्ष के अवसर पर यहाँ पित्रो को बड़ा हीं आदर दिया जाता है। मान्यता है की सर्व पितृ आमावश्या के दौरान गया में पितरों को पानी देने से वो तृप्त होते हैं और बैकुंठ पहुँचते हैं।

विष्णुपद मंदिर गया

इसी गया क्षेत्र में भगवान विष्णु का भव्य मंदिर है। भगवान विष्णु के पध्य् चिन्ह होने से हीं इसे विष्णुपद मंदिर कहा गया है। धर्म का एक आधार होने के कारण हीं इसे धर्मशिला भी कहा जाता है। माना जाता है की पितरों के तर्पण के बाद इस मंदिर में भगवान विष्णु के चरणों का दर्शन करने से सारे दुखों का नाश हो जाते हैं। मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी है।

कहा जाता है यहाँ पर एक समय राक्षस गयाशुर का वर्चस्प था। वह लोगों को काफी प्रतरित करता था। उसी राक्षस को नियंत्रित करने के लिए भगवान विष्णु ने शिला रखकर उसे दबा दिया था। इसी कारण शिला पर भगवान विष्णु के चरण के छाप छप गए। विष्णुपद मंदिर का निर्माण कसौटी पत्थरों से हुआ है। विष्णुपद मंदिर की उचाई करीब 100 फीट है। सभा मंडप में कुल 44 स्थंभ है। 54 विधियों में से 19 विधि विश्व पन्ने की है जहाँ पर पितरों के मुक्ति के लिए पिंडदान होता है।

महावीर मंदिर, पटना

अब बात करेंगे पटना के महावीर मंदिर की। यह मंदिर भगवान श्री हनुमान जी को समर्पित है। इतना हीं नहीं ये मंदिर बिहार के साथ साथ देश के सर्वोत्तम और प्राचीन हनुमान मंदिर में से एक है। लाखों भक्तों के आस्था से जुड़ा यह मंदिर अपनी धार्मिक महत्व और मान्यताओं के लिए जाना जाता है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है की यहाँ आने वाले सभी भक्तों की मुराद जरूर पूरी होती है और कोई भी भक्त यहाँ से खाली हाथ नहीं लौटता है।

महावीर मंदिर पटना

इस मंदिर के निर्माण में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल और उनके सहियोगियों का काफी भूमिका रही और उनका बड़ा योगदान रहा। आचार्य किशोर कुणाल हीं इस मंदिर के ट्रस्ट के सचिव भी हैं। इस मंदिर के सहयोग से हीं अयोध्या स्थित भगवान श्री राम के मंदिर में प्रतिदिन सीता रसोई का आयोजन किया जा रहा है।

इसके तहत हजारों लोगों को भोजन भी कराया जाता है। महावीर मंदिर का निर्माण स्वेक्षा से आये हुए दान की राशि से हुआ है। इसके पुनर्निर्माण के दौरान आयोजित की गयी कार्यसेवा में हजारों लोग शामिल हुए थे और स्वेक्षा से लोगों ने दान किया था। मंदिर में श्री हनुमान जी की दो युग्म प्रतिमाएं एक साथ हैं। पहली प्रतिमा परित्राणाय साधु नाम है जिसका अर्थ है अच्छे व्यक्तियों के सुरक्षा करना और दूसरी प्रतिमा विनाशाय च दुस्टदान है जिसका मतलब है दुष्ट लोगों की बुराईयां दूर करने के लिए।

इसके अलावे मंदिर परिषर में भगवान राम जी, भगवान श्री कृष्ण और दुर्गा माता की भी मंदिर है। इन मंदिर में राधाकृष्ण, राम – सीता, शिव – पार्वती नंदी, भगवान गणेश समेत तमाम देवी देवताओं की मूर्ति स्थापित है। इसके अलावे इस मंदिर के बगल में पीपल का पेड़ भी है जिसमें भगवान शनि देव विराजमान हैं। इसके प्रथम मंजिल पर एक अस्थायी राम सेतु का पत्थर भी लगा हुआ है। यह पत्थर कांच के एक पात्र में रखा हुआ है। इस पत्थर का विशिष्ट भार 13000mm है जबकि इसका कुल वजन 15 किलो है और यह पानी में तैर रहा है जोकि कभी डूबता नहीं है। यह मंदिर पटना रेलवे स्टेशन पर स्थित है।

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